मेरी उड़ान - लिप्सा कौर

                                                                           मेरी उड़ान 
           
                                   लिप्सा कौर 


अभी कुछ उड़ना ही शुरू हुई थी मैं की.
पर कुछ समझने लगयी थी मैं.
कुछ समझ पा रही थी मैं.
की कुछ सफल होने लगयी हु मैं.
सफल हो जॉगयी मैं.
फिर से उठ पाउगी मैं.
कई बार बंद की है अपनी आँखो को मैंने. ये सोच कर की
खुले आसमान मे चमकाने लगयी मे.
एक सीतारा बन कर
एक रौशनी बन कर
और होगा सूर्य की किरणे के समान मेरा नाम.
ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार सूर्य की किरणे चारो ओर फैला कर अपनी सुखमय किरणे.
ठीक उसी प्रकार होगा मेरा नाम.
फिर से जी पाउगी मैं!!




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