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Showing posts from September, 2019

अंतरात्मा : वीरेंद्र कुमार

अन्तरात्मा ------------- पास हमेशा मेरे थी तू, मैं तुझ से अनजान रहा। कहना तेरा सुना न मैंने, और तुझे अपना न कहा। कभी भरोसा किया न तुझ पर, मुझको तो अभिमान रहा। दर- दर रहा भटकता मैं हूँ, जाने कितने कष्ट सहा। भटकाते जो रहे राह से, उनका मैंने हाथ गहा। पहचान न पाया तुझको मैं, मैंने की है भूल महा। मैं कितना हूँ बड़ा अनाड़ी, जो बहाव के साथ बहा।                                            वीरेंद्र कुमार

अनजान : वीरेंद्र कुमार

अनजान ----------- मैं बड़ा हूँ और छोटे, मेरी अलग पहचान है। संसार के संघर्ष की जड़, सिर्फ यह अभिमान है। समझ बैठा अमर खुद को,  संसार में इंसान है। अज्ञान में भूला सभी, वह खुद बना भगवान है। क्षणिक जग को देखता है, फिर भी  बना अनजान है। जायगा मिट दिवस इक वह, कुछ वक्त का महमान है। ना भेद ईश्वर ने किया, दी देह एक समान है। कर्म से निज जीव पाता, संसार में सम्मान है।                       वीरेंद्र कुमार

जीवन : वीरेंद्र कुमार

जीवन --------- यह जीवन है बहता पानी। पर हित को यह मिली जवानी। सब कुछ तुझको दिया प्रभू ने। दुनिया को क्या दिया है तूने। बहुत कमा ली तू ने दौलत। नेक काम को पायी मुहलत। कितनी दौलत और कमानी? क्या इसमें ही उमर गँवानी? दुनिया तूने लूटी जमकर। दर जाना है तुझको यम के। कर्मों का फल तुझे भोगना। धर्म करो बस और ढोंग ना। सुन अंतस् की अब तो वानी। यह दुनिया है आनी-जानी। चूसा कितना अब रहने दो। दीनों को अब तो जीने दो। धर्म-कर्म से नाता जोड़ो। और पाप का खाना छोड़ो। एक दिन दुनिया तज कर जानी। छोड़ो अब तो अकड़ दिखानी।          वीरेंद्र कुमार

आओ मोहन वंशी वारे: वीरेंद्र कुमार

आओ मोहन वंशी वारे। ----------------------------- कान्हा प्यारे!नन्द दुलारे! कहाँ बसे हो श्याम पियारे। आज निराशा ने सब घेरे, हृदयों में हैं घोर अँधेरे  । कल-कल करती यमुना छेड़े, विरह राग हर साँझ सवेरे। नैना हर पल वाट निहारें, कब आओगे पास हमारे? बंशी के स्वर शांत पड़े हैं, गौऐं ग्वाले मौन खड़े हैं। व्याकुल गोपी बोल मरे हैं, खाली घट इक ओर धरे हैं। अब ना कोई कंकर मारे, ना मारग में बाधा डारे। उर कातर हो निरख रहा है, माखन मिश्री बिलख रहा है। तेरे बिन अब चैन कहाँ है। हर कोई अब व्यथित यहाँ है। राधा  टेरत  द्वारे-द्वारे , आओ मोहन बंशी वारे। वीरेंद्र कुमार

काहे करत गुमान :- वीरेंद्र कुमार

काहे करत गुमान। ------------------------ मन रे काहे करत गुमान। कोई बड़ा न छोटा कोई, जग में हैं सब लोग समान। साथ न कुछ अपने जावेगा, करता है तू क्यों अभिमान। यह दुनिया तो आनी जानी, बनता है तू क्यों अनजान। सब राही हैं एक मंजिल के, कुछ दिन के हैं बस महमान। मान प्रतिष्ठा झूठे हैं सब, व्यर्थ लड़े जग में इंसान। राह अलग हैं बेशक सबकी, होते नहीं अलग भगवान। कर्मों का लेखा रखते वे, क्यों बनता तू व्यर्थ महान। वीरेंद्र कुमार

रे मन पगले : वीरेंद्र कुमार

रे मन पगले... ------------------ रे मन पगले क्यूँ रोता है? सुनता नहीं अन्तस् की बातें, अँसुओं से मुँह क्यों धोता है? कोई साथ न देता जग में, पाप अकेले क्यूँ ढोता है? लिये लालसा मन में सुख की, काँटे डग में क्यों क्यूँ बोता है? एक दिन यूँ ही उड़ जायेगा, छोड़ पींजरा मन तोता है। स्वारथ तक जग की प्रीती, कोई संग नहीं होता है। मोह जाल में भूल गया तू, जग का हर नाता थोता है। फँस चक्कर में विषयों के तू, मान प्रतिष्ठा क्यूँ खोता है? पापों में रत रहा उमर भर, वक्त बुरा खुद ने न्यौता है। अब क्यूँ धुनता सिर अपना तू, रहा जनम भर जब सोता है।           वीरेंद्र कुमार

आप अच्छे लगते हो-- लिप्सा कौर

                    #आप अच्छे लगते हो #                                         लिप्सा कौर जाने क्यों अच्छे लगते हो तुम.... ना जानती हू, ना पहचानती हू... बस इतना समझती हू ! कोइ ना कोइ रिश्ता जरूर होगा ! तभी तो मिले है हम ! हाँ समझती हू, ऊंचा सर है तुम्हारा मुझसे ! तुम्हारा शांत सा चेहरा मानो पूर्णिमा का शीतल चाँद हो... तुम्हारी आँखे मानो जैसे नैनीताल की मोह ने वाली प्रकृति की छाया हो ! तुम इतने बहुमुखी प्रतिभा के धनी हो की ये तुम खुद ही नहीं जानते. ठीक हिरन के समान. जिस प्रकार हिरण अपनी नाभि से आने वाली सुगंध को स्वयं नहीं जनता ओर वह इधर उधर निहारता फिरता है. ठीक उसी तरह तुम हो सच मे तुम बोहत अच्छे लगते हो... ---लिप्सा समर्पित @डॉ राजेश कुमार ठाकुर

हलाहल - राजेश कुमार ठाकुर

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                                                राजेश कुमार ठाकुर 

प्यार का पैगाम - राजेश कुमार ठाकुर

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नयी आशा - राजेश कुमार ठाकुर

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भूली राहें - राजेश कुमार ठाकुर

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भूली राहें  राजेश कुमार ठाकुर 

पाती - डॉ राजेश कुमार ठाकुर

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मेरी उड़ान - लिप्सा कौर

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                                                                            मेरी उड़ान                                                 लिप्सा कौर  अभी कुछ उड़ना ही शुरू हुई थी मैं की. पर कुछ समझने लगयी थी मैं. कुछ समझ पा रही थी मैं. की कुछ सफल होने लगयी हु मैं. सफल हो जॉगयी मैं. फिर से उठ पाउगी मैं. कई बार बंद की है अपनी आँखो को मैंने. ये सोच कर की खुले आसमान मे चमकाने लगयी मे. एक सीतारा बन कर एक रौशनी बन कर और होगा सूर्य की किरणे के समान मेरा नाम. ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार सूर्य की किरणे चारो ओर फैला कर अपनी सुखमय किरणे. ठीक उसी प्रकार होगा मेरा नाम. फिर से जी पाउगी मैं!! ------------------ **** ------------------------

मेरी चाहत मेरा अहसास - लिप्सा कौर

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                                मेरी चाहत मेरा अहसास                                                         लिप्सा कौर  तुम्हारा हाथ अपने हाथों मे लेकर मैं.  वक्त से ज्यादा तुम्हे थामना चाहती हूँ  ! पर मैं जानती हूँ  हाँ वक्त बड़ा बलवान है,  मजबूत है,  सर्वाधिक दाता है वो.  पर ये भी माना है मैंने , की जो की सृष्टि का नियम है - जो आया है, उसने जाना ही है,  ओर उसका जाना निश्चित है.  पर कोशिश है मेरी,  तुझे थामु मैं ता उम्र -- की वक्त भी ये झुक जाये इस क़दर  की आने वाले कई जन्म तेरा मेरा साथ रहे ! अब तो खुदा से यही दुआ है मेरी,  काश ये वक्त यही रुक जाये  और थमा रहे तेरा हाथ मेरे हाथों मे यु ही  ! -------------- ***** ----------------------***** -  मेरी छोटी सी ये कोशिश ...