अंतरात्मा : वीरेंद्र कुमार
अन्तरात्मा ------------- पास हमेशा मेरे थी तू, मैं तुझ से अनजान रहा। कहना तेरा सुना न मैंने, और तुझे अपना न कहा। कभी भरोसा किया न तुझ पर, मुझको तो अभिमान रहा। दर- दर रहा भटकता मैं हूँ, जाने कितने कष्ट सहा। भटकाते जो रहे राह से, उनका मैंने हाथ गहा। पहचान न पाया तुझको मैं, मैंने की है भूल महा। मैं कितना हूँ बड़ा अनाड़ी, जो बहाव के साथ बहा। वीरेंद्र कुमार