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अंतरात्मा : वीरेंद्र कुमार
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अन्तरात्मा ------------- पास हमेशा मेरे थी तू, मैं तुझ से अनजान रहा। कहना तेरा सुना न मैंने, और तुझे अपना न कहा। कभी भरोसा किया न तुझ पर, मुझको तो अभिमान रहा। दर- दर रहा भटकता मैं हूँ, जाने कितने कष्ट सहा। भटकाते जो रहे राह से, उनका मैंने हाथ गहा। पहचान न पाया तुझको मैं, मैंने की है भूल महा। मैं कितना हूँ बड़ा अनाड़ी, जो बहाव के साथ बहा। वीरेंद्र कुमार
अनजान : वीरेंद्र कुमार
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अनजान ----------- मैं बड़ा हूँ और छोटे, मेरी अलग पहचान है। संसार के संघर्ष की जड़, सिर्फ यह अभिमान है। समझ बैठा अमर खुद को, संसार में इंसान है। अज्ञान में भूला सभी, वह खुद बना भगवान है। क्षणिक जग को देखता है, फिर भी बना अनजान है। जायगा मिट दिवस इक वह, कुछ वक्त का महमान है। ना भेद ईश्वर ने किया, दी देह एक समान है। कर्म से निज जीव पाता, संसार में सम्मान है। वीरेंद्र कुमार
जीवन : वीरेंद्र कुमार
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जीवन --------- यह जीवन है बहता पानी। पर हित को यह मिली जवानी। सब कुछ तुझको दिया प्रभू ने। दुनिया को क्या दिया है तूने। बहुत कमा ली तू ने दौलत। नेक काम को पायी मुहलत। कितनी दौलत और कमानी? क्या इसमें ही उमर गँवानी? दुनिया तूने लूटी जमकर। दर जाना है तुझको यम के। कर्मों का फल तुझे भोगना। धर्म करो बस और ढोंग ना। सुन अंतस् की अब तो वानी। यह दुनिया है आनी-जानी। चूसा कितना अब रहने दो। दीनों को अब तो जीने दो। धर्म-कर्म से नाता जोड़ो। और पाप का खाना छोड़ो। एक दिन दुनिया तज कर जानी। छोड़ो अब तो अकड़ दिखानी। वीरेंद्र कुमार
आओ मोहन वंशी वारे: वीरेंद्र कुमार
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आओ मोहन वंशी वारे। ----------------------------- कान्हा प्यारे!नन्द दुलारे! कहाँ बसे हो श्याम पियारे। आज निराशा ने सब घेरे, हृदयों में हैं घोर अँधेरे । कल-कल करती यमुना छेड़े, विरह राग हर साँझ सवेरे। नैना हर पल वाट निहारें, कब आओगे पास हमारे? बंशी के स्वर शांत पड़े हैं, गौऐं ग्वाले मौन खड़े हैं। व्याकुल गोपी बोल मरे हैं, खाली घट इक ओर धरे हैं। अब ना कोई कंकर मारे, ना मारग में बाधा डारे। उर कातर हो निरख रहा है, माखन मिश्री बिलख रहा है। तेरे बिन अब चैन कहाँ है। हर कोई अब व्यथित यहाँ है। राधा टेरत द्वारे-द्वारे , आओ मोहन बंशी वारे। वीरेंद्र कुमार
काहे करत गुमान :- वीरेंद्र कुमार
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काहे करत गुमान। ------------------------ मन रे काहे करत गुमान। कोई बड़ा न छोटा कोई, जग में हैं सब लोग समान। साथ न कुछ अपने जावेगा, करता है तू क्यों अभिमान। यह दुनिया तो आनी जानी, बनता है तू क्यों अनजान। सब राही हैं एक मंजिल के, कुछ दिन के हैं बस महमान। मान प्रतिष्ठा झूठे हैं सब, व्यर्थ लड़े जग में इंसान। राह अलग हैं बेशक सबकी, होते नहीं अलग भगवान। कर्मों का लेखा रखते वे, क्यों बनता तू व्यर्थ महान। वीरेंद्र कुमार