अनजान : वीरेंद्र कुमार

अनजान
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मैं बड़ा हूँ और छोटे,
मेरी अलग पहचान है।
संसार के संघर्ष की जड़,
सिर्फ यह अभिमान है।
समझ बैठा अमर खुद को,
 संसार में इंसान है।
अज्ञान में भूला सभी,
वह खुद बना भगवान है।
क्षणिक जग को देखता है,
फिर भी  बना अनजान है।
जायगा मिट दिवस इक वह,
कुछ वक्त का महमान है।
ना भेद ईश्वर ने किया,
दी देह एक समान है।
कर्म से निज जीव पाता,
संसार में सम्मान है।

                      वीरेंद्र कुमार

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