काहे करत गुमान :- वीरेंद्र कुमार
काहे करत गुमान।
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मन रे काहे करत गुमान।
कोई बड़ा न छोटा कोई,
जग में हैं सब लोग समान।
साथ न कुछ अपने जावेगा,
करता है तू क्यों अभिमान।
यह दुनिया तो आनी जानी,
बनता है तू क्यों अनजान।
सब राही हैं एक मंजिल के,
कुछ दिन के हैं बस महमान।
मान प्रतिष्ठा झूठे हैं सब,
व्यर्थ लड़े जग में इंसान।
राह अलग हैं बेशक सबकी,
होते नहीं अलग भगवान।
कर्मों का लेखा रखते वे,
क्यों बनता तू व्यर्थ महान।
वीरेंद्र कुमार
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मन रे काहे करत गुमान।
कोई बड़ा न छोटा कोई,
जग में हैं सब लोग समान।
साथ न कुछ अपने जावेगा,
करता है तू क्यों अभिमान।
यह दुनिया तो आनी जानी,
बनता है तू क्यों अनजान।
सब राही हैं एक मंजिल के,
कुछ दिन के हैं बस महमान।
मान प्रतिष्ठा झूठे हैं सब,
व्यर्थ लड़े जग में इंसान।
राह अलग हैं बेशक सबकी,
होते नहीं अलग भगवान।
कर्मों का लेखा रखते वे,
क्यों बनता तू व्यर्थ महान।
वीरेंद्र कुमार
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