आओ मोहन वंशी वारे: वीरेंद्र कुमार

आओ मोहन वंशी वारे।
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कान्हा प्यारे!नन्द दुलारे!
कहाँ बसे हो श्याम पियारे।
आज निराशा ने सब घेरे,
हृदयों में हैं घोर अँधेरे  ।
कल-कल करती यमुना छेड़े,
विरह राग हर साँझ सवेरे।
नैना हर पल वाट निहारें,
कब आओगे पास हमारे?

बंशी के स्वर शांत पड़े हैं,
गौऐं ग्वाले मौन खड़े हैं।
व्याकुल गोपी बोल मरे हैं,
खाली घट इक ओर धरे हैं।
अब ना कोई कंकर मारे,
ना मारग में बाधा डारे।

उर कातर हो निरख रहा है,
माखन मिश्री बिलख रहा है।
तेरे बिन अब चैन कहाँ है।
हर कोई अब व्यथित यहाँ है।
राधा  टेरत  द्वारे-द्वारे ,
आओ मोहन बंशी वारे।

वीरेंद्र कुमार

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