अंतरात्मा : वीरेंद्र कुमार

अन्तरात्मा
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पास हमेशा मेरे थी तू,
मैं तुझ से अनजान रहा।

कहना तेरा सुना न मैंने,
और तुझे अपना न कहा।

कभी भरोसा किया न तुझ पर,
मुझको तो अभिमान रहा।

दर- दर रहा भटकता मैं हूँ,
जाने कितने कष्ट सहा।

भटकाते जो रहे राह से,
उनका मैंने हाथ गहा।

पहचान न पाया तुझको मैं,
मैंने की है भूल महा।

मैं कितना हूँ बड़ा अनाड़ी,
जो बहाव के साथ बहा।
               
                           वीरेंद्र कुमार

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