रे मन पगले : वीरेंद्र कुमार

रे मन पगले...
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रे मन पगले क्यूँ रोता है?
सुनता नहीं अन्तस् की बातें,
अँसुओं से मुँह क्यों धोता है?
कोई साथ न देता जग में,
पाप अकेले क्यूँ ढोता है?
लिये लालसा मन में सुख की,
काँटे डग में क्यों क्यूँ बोता है?
एक दिन यूँ ही उड़ जायेगा,
छोड़ पींजरा मन तोता है।
स्वारथ तक जग की प्रीती,
कोई संग नहीं होता है।
मोह जाल में भूल गया तू,
जग का हर नाता थोता है।
फँस चक्कर में विषयों के तू,
मान प्रतिष्ठा क्यूँ खोता है?
पापों में रत रहा उमर भर,
वक्त बुरा खुद ने न्यौता है।
अब क्यूँ धुनता सिर अपना तू,
रहा जनम भर जब सोता है।
         
वीरेंद्र कुमार

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